रजनीश कुमार, गढ़वा
झारखंड में नगर निकाय चुनाव की सरगर्मी चरम पर है। इसी कड़ी में गढ़वा नगर परिषद क्षेत्र में अध्यक्ष पद को लेकर चुनावी मुकाबला अब अंतिम चरण में पहुंच चुका है। नगर ।परिषद क्षेत्र में अध्यक्ष पद के लिए कुल 12 प्रत्याशी मैदान में हैं, जिससे मुकाबला काफी दिलचस्प और बहुकोणीय हो गया है। हालांकि यह चुनाव दलीय आधार पर नहीं हो रहा है, लेकिन विभिन्न राजनीतिक दलों का परोक्ष समर्थन चुनाव को राजनीतिक रंग दे रहा है।
मुख्य मुकाबला किनके बीच?
चुनाव मैदान में भाजपा समर्थित प्रत्याशी के रूप में कंचन जायसवाल उतरी हैं, जबकि झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) समर्थित उम्मीदवार के तौर पर संतोष केसरी चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता अलखनाथ पांडे भी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में ताल ठोक रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो असली और सीधा मुकाबला संतोष केसरी और अलखनाथ पांडे के बीच देखा जा रहा है। हालांकि कंचन जायसवाल भी मजबूत दावेदार मानी जा रही हैं, क्योंकि उन्हें भाजपा का समर्थन प्राप्त है।
दिग्गज नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर
इस चुनाव को और रोचक बनाने वाली बात यह है कि कंचन जायसवाल के समर्थन में वर्तमान विधायक सत्येंद्र नाथ तिवारी पूरी ताकत झोंक रहे हैं। वे लगातार जनसंपर्क और रणनीतिक बैठकों के माध्यम से चुनावी माहौल को अपने पक्ष में करने का प्रयास कर रहे हैं। दूसरी ओर संतोष केसरी के समर्थन में राज्य के पूर्व मंत्री मिथिलेश ठाकुर मोर्चा संभाले हुए हैं। वे भी जनसभाओं और घर-घर संपर्क अभियान के जरिए अपने समर्थित प्रत्याशी को जीत दिलाने में जुटे हैं। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि भाजपा से जुड़े वरिष्ठ नेता रहे अलखनाथ पांडे को पार्टी का आधिकारिक समर्थन नहीं मिला है, फिर भी वे निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में पूरी मजबूती से चुनाव मैदान में डटे हुए हैं। शहर में उनकी सक्रियता और जनसंपर्क अभियान ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है।
त्रिकोणीय या सीधा मुकाबला?
हालांकि कुल 12 प्रत्याशी मैदान में हैं, लेकिन चर्चा मुख्यतः तीन नामों के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अंतिम समय में वोटों का ध्रुवीकरण निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
यदि भाजपा समर्थक वोट पूरी तरह कंचन जायसवाल के पक्ष में एकजुट होते हैं तो समीकरण बदल सकते हैं। वहीं यदि पारंपरिक जनाधार और स्थानीय समीकरण संतोष केसरी के पक्ष में जाता है तो वे मजबूत स्थिति में आ सकते हैं। दूसरी ओर अलखनाथ पांडे की व्यक्तिगत छवि और स्थानीय पकड़ भी परिणाम को प्रभावित कर सकती है।
मतदाताओं पर टिकी नजर
अब पूरा दारोमदार गढ़वा नगर परिषद के मतदाताओं पर है कि वे किसे अपना समर्थन देकर अध्यक्ष पद की कुर्सी तक पहुंचाते हैं। स्थानीय मुद्दे—जैसे सड़क, जल निकासी, साफ-सफाई, पेयजल और शहरी विकास—मतदाताओं के निर्णय में अहम भूमिका निभा सकते हैं। चुनावी जंग अपने चरम पर है और सभी प्रत्याशी पूरी ताकत से मैदान में डटे हुए हैं। अब देखना यह होगा कि मतदाता किसे अपनी उम्मीदों का प्रतिनिधि चुनते हैं और गढ़वा नगर परिषद की बागडोर किसके हाथों में सौंपते हैं।












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