केवट प्रसंग और भरत चरित्र ने श्रद्धालुओं को किया भावुक

रजनीश कुमार, गढ़वा

चैत्र नवरात्र के पावन अवसर पर गढ़वा स्थित नरगिर आश्रम में आयोजित नवाह परायण सह रामकथा अमृत वर्षा कार्यक्रम के सातवें दिन अयोध्या से पधारे कथावाचक पूज्य संत बालस्वामी ने रामायण के कई मार्मिक प्रसंगों की भावपूर्ण व्याख्या कर श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। कथा स्थल पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी रही और पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा। संत बालस्वामी ने कहा कि रामकथा केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि त्याग, प्रेम, बलिदान और समर्पण की जीवंत गाथा है। उन्होंने केवट प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि केवट, जो मल्लाह जाति का एक सामान्य और अशिक्षित व्यक्ति था, उसने अपने निष्कलंक प्रेम और भक्ति से स्वयं भगवान श्रीराम को अपनी बात मानने पर विवश कर दिया। कथावाचक ने बताया कि केवट ने भगवान श्रीराम के चरण धोने का आग्रह करते हुए कहा कि उनके चरणों की धूल में अद्भुत शक्ति है, जिससे पत्थर भी नारी बन सकता है। उसकी नाव काठ की बनी है और वही उसकी जीविका का साधन है, इसलिए वह बिना चरण धोए प्रभु को नाव पर नहीं बैठाएगा। अंततः केवट ने प्रभु के चरण धोकर चरणामृत ग्रहण किया और अपनी कई पीढ़ियों का उद्धार किया। गंगा पार कराने के बाद जब भगवान राम ने उसे उतराई देनी चाही, तो केवट ने अत्यंत विनम्र भाव से कहा कि “प्रभु, मैं भी केवट हूं और आप भी इस संसार रूपी भवसागर के पार लगाने वाले हैं। जब मैं आपके घाट आऊं, तब आप मुझे पार लगा देना।” यह प्रसंग मानवता, समानता और सच्ची भक्ति का अनुपम संदेश देता है। कथा के दौरान संत बालस्वामी ने आगे बताया कि भारद्वाज मुनि और महर्षि वाल्मीकि से मिलकर भगवान राम चित्रकूट की ओर प्रस्थान करते हैं। चित्रकूट, जो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित एक पवित्र तीर्थ है, भगवान राम के वनवास काल का प्रमुख निवास स्थल रहा है। मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित यह स्थान कामदगिरी पर्वत, रामघाट और गुप्त गोदावरी जैसी पौराणिक स्थलों के लिए प्रसिद्ध है, जहां प्रकृति और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। संत बालस्वामी ने भरत चरित्र का वर्णन करते हुए उसे त्याग, निस्वार्थ प्रेम और धर्मपरायणता की सर्वोच्च मिसाल बताया। उन्होंने कहा कि महाराज दशरथ और माता कैकेयी के पुत्र भरत ने राजपाट को ठुकराकर अपने बड़े भाई राम के प्रति अनन्य भक्ति का परिचय दिया। भरत ने राम की पादुकाओं को सिंहासन पर स्थापित कर स्वयं तपस्वी जीवन अपनाते हुए 14 वर्षों तक राज्य का संचालन किया।
उन्होंने बताया कि जब माता कैकेयी ने राम के लिए वनवास और भरत के लिए राज्य मांगा, तो भरत ने न केवल सिंहासन स्वीकार करने से इंकार किया, बल्कि उन्होंने अपनी माता के इस निर्णय का विरोध करते हुए राम को वापस लाने का प्रयास किया। चित्रकूट पहुंचकर उन्होंने राम से लौटने का आग्रह किया, लेकिन जब राम नहीं माने, तो उन्होंने उनकी चरण पादुका को ही राजा मानकर शासन किया। कथावाचक ने अपने प्रवचन में कहा कि रामायण का प्रत्येक प्रसंग आज भी हमारे जीवन के लिए प्रेरणादायक है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को हानि होने पर निराश नहीं होना चाहिए और लाभ होने पर लोभ से बचना चाहिए। निष्काम भाव से की गई भक्ति ही सच्ची और श्रेष्ठ भक्ति होती है।

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