परमेश्वरी मेडिकल सेंटर ने बचाई तीन युवतियों की जान, आपातकालीन सर्जरी से मिला नया जीवन

रजनीश कुमार, गढ़वा

गढ़वा के परमेश्वरी मेडिकल सेंटर ने एक बार फिर अपनी चिकित्सकीय दक्षता और त्वरित आपातकालीन सेवा का परिचय देते हुए तीन युवा महिलाओं की जान बचाने में सफलता हासिल की है। अस्पताल में हाल ही में तीन ऐसी युवतियों को गंभीर अवस्था में भर्ती कराया गया, जो रप्चर्ड एक्टोपिक प्रेग्नेंसी (गर्भाशय के बाहर भ्रूण का फटना) और पेट के भीतर अत्यधिक रक्तस्राव (हेमोपेरिटोनियम) जैसी जानलेवा स्थिति से जूझ रही थीं। समय रहते की गई आपातकालीन सर्जरी और विशेषज्ञ चिकित्सा प्रबंधन के कारण तीनों मरीजों को नया जीवन मिला। जानकारी के अनुसार 20 से 25 वर्ष आयु वर्ग की इन तीनों मरीजों की स्थिति अस्पताल पहुंचने के समय अत्यंत नाजुक थी। अत्यधिक अंदरूनी रक्तस्राव के कारण उनकी हालत लगातार बिगड़ रही थी। ऐसे में परमेश्वरी मेडिकल सेंटर के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. निशांत एवं डॉ. नीतू के नेतृत्व में मेडिकल टीम ने तत्काल निर्णय लेते हुए आपातकालीन ऑपरेशन किया। प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ की सक्रिय भूमिका और चिकित्सकों की विशेषज्ञता के कारण तीनों मरीजों का सफल उपचार संभव हो सका। वर्तमान में सभी मरीज सुरक्षित हैं तथा तेजी से स्वस्थ हो रही हैं।

आठ वर्षों में 100 से अधिक महिलाओं की बचाई जान

परमेश्वरी मेडिकल सेंटर का आपातकालीन स्त्री रोग उपचार के क्षेत्र में उल्लेखनीय रिकॉर्ड रहा है। अस्पताल प्रबंधन के अनुसार पिछले आठ वर्षों के दौरान यहां एक्टोपिक प्रेग्नेंसी के 100 से अधिक सफल ऑपरेशन किए जा चुके हैं। इस उपलब्धि ने अस्पताल को गढ़वा एवं आसपास के क्षेत्रों में जटिल स्त्री रोग और आपातकालीन उपचार के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित किया है।
अस्पताल द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार इन मामलों में लगभग 60 प्रतिशत मरीजों का इलाज आधुनिक लैप्रोस्कोपिक तकनीक (कीहोल सर्जरी) से किया गया, जिससे मरीजों को कम दर्द, कम रक्तस्राव और शीघ्र स्वस्थ होने का लाभ मिला। वहीं गंभीर और अत्यधिक रक्तस्राव वाले मामलों में ओपन सर्जरी कर मरीजों की जान बचाई गई।
क्या होती है एक्टोपिक प्रेग्नेंसी?

चिकित्सकों के अनुसार सामान्य गर्भावस्था में निषेचित अंडा गर्भाशय के भीतर विकसित होता है, लेकिन एक्टोपिक प्रेग्नेंसी में यह गर्भाशय के बाहर, प्रायः फैलोपियन ट्यूब में विकसित होने लगता है। भ्रूण के बढ़ने के साथ ट्यूब फट सकती है, जिससे पेट के भीतर भारी मात्रा में रक्तस्राव शुरू हो जाता है। यह स्थिति अत्यंत गंभीर होती है और समय पर उपचार नहीं मिलने पर मरीज की जान भी जा सकती है। मामले की गंभीरता पर प्रकाश डालते हुए डॉ. निशांत ने बताया कि तीनों मरीज अस्पताल पहुंचने के समय अत्यधिक अंदरूनी रक्तस्राव के कारण हाइपोवोलेमिक शॉक की स्थिति में थीं। उन्होंने कहा, “ऐसे मामलों में हर सेकंड महत्वपूर्ण होता है। हमारी टीम ने तुरंत बीमारी की पहचान की, मरीजों की स्थिति को स्थिर किया और इमरजेंसी सर्जरी कर रक्तस्राव को नियंत्रित करते हुए उनकी जान बचाई।” शुरुआती गर्भावस्था में दर्द को हल्के में न लें महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. नीतू ने कहा कि गर्भावस्था के शुरुआती दिनों में होने वाले हर दर्द को सामान्य मान लेना खतरनाक साबित हो सकता है। उन्होंने बताया, “यदि गर्भावस्था के शुरुआती चरण में पेट या पेड़ू के निचले हिस्से में तेज, चुभने वाला या असहनीय दर्द हो, तो इसे सामान्य नहीं समझना चाहिए। यह एक्टोपिक प्रेग्नेंसी का संकेत हो सकता है और तत्काल चिकित्सकीय जांच जरूरी है।”
डॉक्टरों के अनुसार पेट के एक हिस्से में तीव्र दर्द, योनि से रक्तस्राव, कंधे में अचानक दर्द, चक्कर आना, बेहोशी, ठंडा पसीना आना और दिल की धड़कन का असामान्य रूप से तेज होना गंभीर खतरे के संकेत हैं। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर तुरंत अस्पताल पहुंचना चाहिए।
ऑपरेशन में देरी जानलेवा साबित हो सकती है चिकित्सकों ने बताया कि कई बार मरीज और उनके परिजन स्थिति की गंभीरता को समझ नहीं पाते और ऑपरेशन का निर्णय लेने में देर कर देते हैं। यह देरी मरीज की जान के लिए खतरा बन सकती है।
डॉ. निशांत और डॉ. नीतू ने संयुक्त रूप से कहा कि एक्टोपिक प्रेग्नेंसी एक मेडिकल इमरजेंसी है, जिसमें समय गंवाने की कोई गुंजाइश नहीं होती। पेट के भीतर लगातार रक्तस्राव होने से मरीज शॉक में चला जाता है और बाद में ऑपरेशन का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए ऐसी स्थिति में चिकित्सकों की सलाह पर भरोसा करते हुए तुरंत उपचार और ऑपरेशन का निर्णय लेना चाहिए।
महिलाओं के लिए विशेष सलाह
सुरक्षित मातृत्व को लेकर परमेश्वरी मेडिकल सेंटर ने महिलाओं और उनके परिवारों से कुछ महत्वपूर्ण सावधानियां बरतने की अपील की है। चिकित्सकों ने सलाह दी है कि गर्भावस्था की पुष्टि होने के बाद छठे से आठवें सप्ताह के बीच अल्ट्रासाउंड अवश्य कराया जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि भ्रूण गर्भाशय के भीतर ही विकसित हो रहा है। इसके अलावा शुरुआती तीन महीनों में किसी भी प्रकार का दर्द या रक्तस्राव होने पर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेने तथा बिना डॉक्टर की सलाह के दर्द निवारक दवाओं का सेवन नहीं करने की अपील की गई है।
अस्पताल प्रबंधन ने कहा कि उनकी टीम पिछले आठ वर्षों से चौबीसों घंटे आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं प्रदान कर रही है और 100 से अधिक महिलाओं की जान बचा चुकी है। प्रबंधन ने भरोसा दिलाया कि भविष्य में भी गढ़वा और आसपास के क्षेत्रों के लोगों को बेहतर, त्वरित और विश्वसनीय स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाती रहेंगी।

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