नरगिर आश्रम में रामकथा के छठे दिन ‘राम वन गमन’ प्रसंग का मार्मिक वर्णन, कर्म और त्याग का दिया संदेश

रजनीश कुमार, गढ़वा

गढ़देवी मंदिर के निकट स्थित प्राचीन नरगिर आश्रम में चैत्र नवरात्र के अवसर पर आयोजित रामकथा के छठे दिन कथा वाचक बालस्वामी प्रपन्नाचार्य ने ‘राम वन गमन’ प्रसंग का अत्यंत भावपूर्ण और विस्तृत वर्णन किया। कथा के दौरान उन्होंने भगवान श्रीराम के वनवास के कारणों, उसके गूढ़ संदेशों और जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को सरल और व्यवहारिक उदाहरणों के माध्यम से समझाया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक जीव को अपने कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। संसार में सुख और दुख का कारण कोई दूसरा नहीं, बल्कि स्वयं का कर्म ही होता है। इसलिए मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति सजग रहना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, प्रकृति स्वयं संकेत देने लगती है—जैसे बालों का सफेद होना—कि अब व्यक्ति को सांसारिक विषयों से विरक्त होकर ईश्वर और अध्यात्म की ओर अग्रसर होना चाहिए। कथा के दौरान उन्होंने राजा दशरथ के प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि जब उन्होंने दर्पण में अपने श्वेत होते बाल देखे, तब उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र राम को राजपद सौंपने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता, वह वास्तविकता का साक्षात दर्शन कराता है। उसी प्रकार गुरु का सान्निध्य मन रूपी दर्पण को स्वच्छ और निर्मल बनाए रखता है। बालस्वामी जी ने कहा कि भगवान राम मर्यादा, त्याग और आदर्श के प्रतीक हैं। उन्होंने अपने पिता के वचन की रक्षा के लिए राजसिंहासन का त्याग कर 14 वर्ष का वनवास सहज भाव से स्वीकार किया। आज के समय में ऐसा त्याग दुर्लभ है। ‘राम वन गमन’ केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि त्याग, धैर्य और कर्तव्य का सर्वोच्च उदाहरण है। उन्होंने बताया कि वनवास की यह यात्रा अयोध्या से प्रारंभ होकर प्रयागराज, चित्रकूट, दंडकारण्य, पंचवटी होते हुए अंततः श्रीलंका तक पहुंचती है। इस यात्रा के दौरान भगवान राम ने केवट, निषादराज और वनवासियों से मित्रता कर समाज को समानता और सद्भाव का संदेश दिया।
कथा में यह भी बताया गया कि विपत्ति के समय ही मनुष्य के धैर्य, धर्म और सच्चे मित्रों की पहचान होती है। कथा के बीच-बीच में बालस्वामी जी द्वारा प्रस्तुत भजन ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम के अंत में रामकथा समिति के अध्यक्ष चंदन जायसवाल ने कहा कि श्रद्धालुओं की बढ़ती उपस्थिति ही आयोजन की सफलता का प्रमाण है। उन्होंने बालस्वामी प्रपन्नाचार्य और उनकी टीम का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके प्रयासों से लगातार पांचवीं बार इस भव्य रामकथा का आयोजन संभव हो पाया है।

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